Wednesday, April 11, 2012

*** ख़बर और लोकप्रियतावाद



ज यदि हम अपने समय के उपलब्ध मीडिया उत्पादों पर नज़र डालें तो पायेंगे कि वे अधिक से अधिक व्यावसायिक लाभ कमाने, अधिक से अधिक लोकप्रिय होने और अत्यधिक सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया में विकसित हुए हैं | बाज़ारवादी मीडिया व्यवस्था किसी भी कीमत पर इन तीन उद्देश्यों को प्राप्त करना चाहती है और इस क्रम में वह वास्तव में नागरिकता की समझ और उसके व्यवहारों को हटाकर उसकी जगह स्वच्छंद स्वभाव के उपभोक्ता को बनाना चाहती है जो अपने पुराने मूल्यों और परम्पराओं से तो संघर्ष करे लेकिन साथ ही वह स्वयं भी एक उत्पाद में परिवर्तित होता चला जाए | उसके उत्पाद में बदलने से यह फ़ायदा होता है कि मीडिया कम्पनियाँ अपने पाठकों-दर्शकों-श्रोताओं को भी बेचती हैं और सारी दुनिया की मार्केट में अपनी साख पैदा करती हैं | इस लिए यह मीडिया व्यवस्था सतही तौर पर तो बेहद आधुनिक और लोकतांत्रिक वातावरण बनाने वाली इकाई दिखती है लेकिन बहुत ही सावधानी के साथ देखा जाए तो उन्होंने मनुष्य की मुक्ति के रास्तों को अब तक के इतिहास में सबसे कठिन बना दिया है | इस समूची व्यवस्था को टेक्नोलॉजी का भी ऐतिहासिक समर्थन प्राप्त है जिसके कारण इसकी संरचना को तोड़न लगभग असंभव है | उसके पास लोगों के समय और उनकी पसंद का बेजोड़ अध्ययन है जिसके बल पर वह उन्हें मनोरंजन के नशे में लगातार बेहोश करती है और कभी भी उनमें विचार करने की ऐसी क्षमता पैदा नहीं होने देती जिससे वे तटस्थ और स्वतंत्र होकर अपने असल मुद्दों की पहचान कर उसका सही विश्लेषण कर सकें | सच कहा जाए तो उसने बहुत ही खूबी से जनता के अड्डों (पब्लिक स्फेयर) का प्रबंधन सीख लिया है | वह लोगों और उनकी मनःस्थिति का व्यापार तो करती ही है साथ ही वह उनके मन को कई खण्डों में विभाजित कर हमेशा तनाव में रखना चाहती है जिससे कभी भी वह तसल्लीबख़्श होकर एकजुट एकाग्रता की स्थति को प्राप्त न होने पाए | यही कारण है कि लोकतांत्रिकता की आड़ में हमारे पास सूचनाओं का अम्बार तो लग जाता है लेकिन सम्प्रेषण के मामले में हम लगातार गरीब होता जा रहें हैं |


ख़बर किसी मीडिया में प्रकाशित होने वाला उत्पाद मात्र नहीं है बल्कि वह एक ऐसा सच है जिसे चाहकर भी हम अपने ज़ेहन से उतार नहीं पायें और बेचैन होकर उस विषय के बारे में अपनी मान्यता बनाए तथा उसे चलते –फिरते अभिव्यक्त करते चलें| उसका विस्तार कुछ इस प्रकार से होना चाहिए कि वह साधारण जन को थोड़ा परिपक्व और थोड़ा संवेदनशील बनाए | उसे ऐसे मनुष्य में परिवर्तित कर दे जो अपने समय के प्रति सचेत हो और उसके लिए श्रम करना सीखे | ख़बर को माध्यम का मोहताज नहीं होना था बल्कि माध्यम को ही ख़बर पर निर्भर होना था लेकिन अब तो यह कहने में कोई संकोच नहीं कि हमारी उनके साथ कोई आत्मीयता नहीं रह गयी है | यह तब और भी आश्चर्यजनक लगता है जब हम अपने इतिहास की ओर देखते हुए यह जानते हैं कि अभी पिछली सदी में ही तो हम ख़बर के माध्यम से सारी दुनिया को जान रहे थे और बड़ी से बड़ी लड़ाईयों को समझ कर उनसे भविष्य की ओर देख रहे थे | अब भी दुनिया के इतिहास को जानने के लिए हम सबको कई बार उनके पास जाना पड़ता है और वे किसी जादू के पिटारे की तरह कहीं न कहीं हमें मिल ही जाती है ! आज तो अखबार के आलावा हमारे पास ख़बरों के और भी बहुत से ठिकाने हैं लेकिन नहीं है तो ख़बर क्योंकि उस तक पहुँचने के लिए हमें भाषा के विविध रूपों के जंगलों और समुद्रों को पार करना पड़ता है ! दूसरे शब्दों में मीडिया का एक अच्छा-खासा हिस्सा मनोरंजन करने और उत्पादों को बेचने में इतना अधिक प्रवृत्त है कि वहाँ पर ख़बर होते हुए भी आसानी से दब जाती है | ऐसी स्थिति में खबर की जो नई समझ पैदा होती है वो कुछ इस तरह की होगी कि जो सूचना आपका मनोरंजन करे और आपका समय बहुत ही आसानी से बिता दे, उसे खबर कहा जा सकता है | इसके साथ ही यह नहीं भूलना चाहिए कि खबर वह ब्रांड भी है जो उसके निर्माताओं को न केवल लाभ दे बल्कि उनके लिए एक स्थायी उपभोक्ता-वर्ग का निर्माण भी करे | तो इस प्रकार हम यह सहज रूप से समझ सकते हैं कि आज खबरों के दो ध्रुव हमारे सामने हैं जिनमें ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के द्वारा एक संघर्ष दिखता है और पब्लिक स्फेयर में वे अक्सर अपनी निश्चित भूमिकाएँ निभाते हुए दिखती हैं | वास्तव में यह पाठक के वातावरण और उसकी ज़रूरत पर निर्भर करता है कि वह किस खबर की ओर रुख करता है | लेकिन यह तो तय  है कि बाज़ारवादी मीडिया व्यवस्था पाठक को मनोवैज्ञानिक रूप से अपनी ज़द में जल्दी से जल्दी लेने का प्रयास बड़े ही सुनियोजित तरीके से करती है | लोगों की मानसिकता और उनकी राय का प्रबंधन करती ये ख़बरें एक अप्रत्यक्ष विज्ञापन का कार्य करती हैं और बहुत से संवेदनशील मुद्दों पर लोकप्रियतावाद का आवरण चढ़ा देती हैं | इसे अलग-अलग माध्यमों के उदाहरणों से बहुत ही आसानी से समझा जा सकता है |

आधुनिक समाजों में खबर का महत्व और उसका प्रभाव अखबार से जुड़ा हुआ है | खबर जब अखबार से संचालित हुयी तो उसने युद्धों में भागीदारी निभायी और राजनीतिक चेतना के विकास में हथियार का काम किया | अखबार की तमाम जगहों की अपनी सत्ता स्थापित हुयी और इस कारण बहुत से संवेदनशील मुद्दों से पाठकों का सामना हुआ | उसके पृष्ठों ने हमें हमारा आज दिखाना शुरू किया जिससे हम इतिहास और विचारधारा से जीवंत संबंध महसूस करने लगे और लोकतंत्र को गंभीरता से लेने की ओर अग्रसर हुए | तब हमारा समूचा ध्यान सत्य को जानने और उसे विश्लेषित करने में लगा हुआ था और वह एक खबर जो हेडलाइन पर आती थी,सबके लिए चर्चा का विषय होती थी | लेकिन बाज़ारवाद द्वारा पोषित खबर की समझ ने अखबार के मुख-पृष्ठ को पोस्टर-पेज में परिवर्तित कर दिया है,जिससे करोड़ों का कारोबार जुड़ा हुआ है| यह ख़बर के इतिहास में विशेष घटना है क्योंकि सुबह-सवेरे जो पन्ना पाठक को देश, समाज और वर्तमान के प्रति सम्वेदनशील बनाता था वह अब अपने प्रकाशित विज्ञापन को ही सबसे बड़ी खबर के रूप में प्रस्तुत कर रहा है | उसने पाठक के सामने यह घोषणा कर दी कि यदि मुख-पृष्ठ पर छपे विज्ञापन पर बात नहीं करोगे तो पिछड़े हुए समझे जाओगे, आखिर लाइफस्टाइल भी कोई चीज़ है ! इस तरह धीरे-धीरे अखबार की जगहें भी भारी लाभ कमाने के अड्डे में रूपांतरित होती चली गयी है जिन्हें वास्तव में सत्य के उद्घाटन के लिए उपयोग में लाया जाना था | कई बार यह स्थति थोड़ा अलग तरीके से दिखती है जब उसी मुख-पृष्ठ के ठीक बीच में विज्ञापन केन्द्रीय आकर्षण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है | एक अखबार में मुख–पृष्ठ पर छपी हुयी खबर थी कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री ऊमर अब्दुल्लाह का बयान आया था कि वे कश्मीर के कुछ हिस्सों से आर्म्ड फोर्सेस एक्ट हटा सकते हैं क्योंकि उन्हें अपने राज्य की पुलिस पर पूरा भरोसा है | इसी के साथ दूसरी ख़बर उसी पन्ने पर यह भी छपी है कि नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने अपनी भारत यात्रा को बहुत ही सकारात्मक बताया है | इन दोनों ख़बरों के बीच में एम.आर.एफ़. कम्पनी के एक टायर का विशाल चित्र इस तरह दिया गया है कि पहला पन्ना देखते ही आपका मन केवल टायर पर टिक जाता है और उस पन्ने की सारी खबरें वहीँ होते हुए भी खत्म हो जाती हैं | बल्कि एक बार तो ज़ेहन को यह भ्रम तक हो जाता है कि जम्मू-कश्मीर अपनी सारी सेना, पुलिस, मुख्यमंत्री और पाठक के मन के साथ उस टायर के नीचे कुचला जा रहा है और आप अपनी सुबह बिता रहे हैं ! यह तो पोस्टर-पेज से भी अधिक क्रूर लगता है क्योंकि यदि टायर वहाँ होता है तो कम से कम टिका होता है और ध्यान को बाँटता नहीं क्योंकि वहाँ पर कोई ख़बर नहीं है लेकिन दूसरी स्थिति तो ख़बर को ही आपातकालीन सेवा की ओर ठेलने का काम करती है | ख़बर की पोज़ीशनिंग की ऐसी उभरती हुयी हालत के साथ यदि भाषा की भूमिका को देखें तो पता लगता है कि वह भी बजाय सम्प्रेषण के माध्यम के मज़े लेने और मनोरंजन करने की वस्तु के रूप में परिवर्तित की जाती है जिससे ख़बरों के लोकप्रियतावादी स्वरुप को ही बल मिलता है और वह कॉमेडी के उत्पाद में तब्दील हो जाती है | मसलन, एथलेटिक्स और महिला-खिलाड़ियों की दयनीय हालत को बजाय राष्ट्रीय मुद्दे में बदलने के यदि गलती से कोई जगह मिल जाती है तो उसकी भाषा भी कुछ ऐसी होती है कि –
                       “ साड़ी की आड़ बनाकर मैदान में कपड़े बदले
प्रतियोगिता में भाग लेने आयी महिला खिलाड़ियों के लिए ड्रेसिंग रूम तक का इंतज़ाम नहीं किया गया जहाँ वे कपड़े बदल सकें | मजबूरन मैदान के एक किनारे साड़ी की आड़ बना महिला एथलीटों को कपड़े बदलने पड़े |”

यहाँ शीर्षक पढ़ने पर यह कहीं पता नहीं लग पाता कि यह ख़बर खेल की दुनिया से जुड़ी हुयी है, बस यह समझ आता है कि किसी की मजबूरी को सस्ते किस्म के मनोरंजन का माध्यम बनाया जा रहा है | इस ख़बर और इसके शीर्षक का कोई संबंध किसी खिलाड़ी की संवेदनशीलता या खेल से जुड़े किसी भी ज़िम्मेदार व्यक्ति से तो नहीं ही लग रहा है जिससे समस्या और भी जटिल होती चली जा रही है लेकिन समाज के लोकप्रियतावादी धड़ों के लिए इस ख़बर में मनोरंजन की कितनी क्षमता होगी यह अवश्य अध्ययन का विषय हो सकता है| कौन लिखता है ऐसी खबरें, कौन इन्हें सहर्ष छापने की अनुमती देता है और कौन पिसता है इन ख़बरों के भीतर यह आज भी चिंतन का विषय नहीं बन पाया है, लेकिन यह भी हमारा ही सच है ! जिस ख़बर को परिवर्तन का माध्यम बनना था जिसे समूची विचार प्रक्रिया को आंदोलित करना था अंततः वह भी सस्ते मनोरंजन का माध्यम बनते हुए अपने साथ कई प्रतिभावान और संभावनाशील लोगों को हमेशा के लिए बहा ले गया !

अगर अंतर्वस्तु (content) के आधार पर इन्टरनेट का अवलोकन करें तो लगता है कि उसका स्थायी या एक चरित्र बनाने में कोई सफलता नहीं मिलती | इसका कारण यह है कि वह अनंत, सर्वकालिक, अंतर्माध्यमिक, बहुलतावादी, अतिलोकतांत्रिक और अंतर्क्रियात्मक माध्यम है | एक बार उसमें लॉग-इन करने पर यह समझ आता है कि उसकी कोई जड़ नहीं है वह इतना विस्तृत है कि वह इस पल भी अंतरिक्ष की तरह फ़ैल रहा है और वह एक समयहीन पात्र है | अखबार या अन्य माध्यमों से अलग वह स्थान और समय से बंधा हुआ नहीं है | लेकिन अंतर्माध्यमिक होने के कारण इसके भीतर अखबार, दूरदर्शन और रेडियो के अलावा अन्य सभी माध्यम समाये हुए हैं और उपभोक्ता द्वारा मांग करने पर यह ठीक-ठीक उनकी भूमिका निभा भी देता है | यही कारण है कि इसमें खबर ठीक वैसे भी बची रहती है जैसे कि अन्य माध्यमों में लेकिन इनके अतिरिक्त वह अपने चरित्र के अनुसार भी ख़बरों को प्रस्तुत करता है | वह इतना अधिक सक्षम है कि एक ही समय में वह अपने विरोधी प्रत्ययों को भी प्रस्तुत कर देता है | लेकिन ख़बरों के मामले में उसकी सबसे निराली बात यह है कि वह उसी क्षण पाठक या उपभोक्ता को भी उसका हिस्सा बना देता है क्योंकि बिना समय गवाएं वह उस पर अपनी प्रतिक्रिया तुरंत दे देता  है, इसलिए वह खबर कि लोकप्रियतावादी दृष्टि को सदैव बल ही प्रदान करता है | ख़बर के जितने भी प्रकार और प्रयोग हो सकते हैं वे सब इस माध्यम पर कभी तो सहज ही और कभी खोजने पर मिल जाते हैं | लेकिन यहाँ पर हमेशा यह एक रहस्य ही बना रहता है कि इन्हें लिखने और संपादित करने वाला कौन है ! बस ख़बरों का अम्बार लगा रहता है | राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, मनोरंजन, खेल, अपराध तथा अन्य प्रकार की ख़बरों का कोई अंत नहीं दिखता और वे लिखित रिपोर्ट, फोटो और वीडियो के रूप में फैली रहती हैं | कहीं कोई निश्चित समय नहीं और न कहीं स्थान का आभास | अगर पाठक स्वयं ही सचेत न हो तो यह ख़बरों की ऐतिहासिक संस्कृति को ध्वस्त करने में सक्षम है क्योंकि यहाँ पर सूचना के साथ सांस्थानिक वैचारिकता का अभाव रहता है और उस पर एक अनंतता का बोध क्योंकि अन्य माध्यमों से अलग यहाँ पर एक ख़बर के साथ उससे जुड़ी अन्य खबरें भी लिंक के रूप में प्रस्तुत रहती हैं | एक बहुचर्चित और अत्यंत लोकप्रिय वेबसाइट ने यह ख़बर प्रकाशित की कि अन्ना दल के सदस्य अरविन्द केजरीवाल ने प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखते हुए अपने नौ लाख तथा सत्ताईस हज़ार रूपये का बकाया टैक्स चुका दिया | ख़बर के अनुसार पत्र में अरविन्द केजरीवाल ने प्रधानमंत्री डॉ.सिंह से हाथ जोड़कर यह प्रार्थना की है कि उनकी सरकार उन लोगों को तकलीफ़ न पहुँचाए जिन्होंने टैक्स चुकाने के लिए उन्हें उधार दिया है | इस पर प्रतिक्रिया देते हुए एक यूज़र ने खुली टिप्पणी में यह लिखा है कि –
“बंटी बबली गैंग किस एन.जी.ओ. के खाते से निकाला यह रुपया.जनता ने चन्दा भ्रष्टाचार मिटाने को दिया था न कि तुम्हारे डीफॉल्ट को चुकाने को”

इस प्रतिक्रिया को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि यूज़र ने अपने गुस्से को अपने पूरे अविश्वास के साथ यहाँ पर प्रकट किया है | लेकिन इनकी भाषा को यदि देखा जाए तो कहने की आवयश्कता नहीं है कि इसमें एक फ़ैसला भी छुपा हुआ है कि ये अन्ना दल को एक मशहूर फ़िल्मी गैंग का दर्जा दे रहें हैं | इनका प्रश्न पूरी तरह उपयुक्त है लेकिन भाषा से यह साफ़ पता चलता है कि खुद ही फ़ैसला सुना देने की बहुत जल्दी है | इसके साथ ही जो अन्य महत्वपूर्ण पहलू यहाँ जुड़ता है वह यह है कि इस ख़बर को पढ़ने के साथ जब ऐसी प्रतिक्रियाओं को पढ़ा जाएगा तो वह विश्लेषण का नहीं बल्कि मनोरंजन का माध्यम बन कर रह जायेगी जिससे उसका लोकप्रियतावादी विस्तार होना ही संभव है | जो उदाहरण यहाँ दिया गया है वह अन्य की तुलना में सभ्य है क्योंकि ऐसी बहुत सी ख़बरें इन्टरनेट पर देखी जा सकती हैं जिसमें उपभोक्ता अश्लील टिप्पणियों के साथ गालियों का भी इस्तेमाल बेझिझक करते हैं | ज़ाहिर है कि भाषा का यह रूप मुद्दों से भटकाने और सस्ता मनोरंजन करने का ऐसा साधन बन जाता है जो कहीं और संभव नहीं !

दूरदर्शन के सन्दर्भ में देखें तो प्रतीत होता है कि वहाँ पर ख़बर जागरूकता,संवेदनशीलता और इतिहास बोध का माध्यम न होकर ‘लाइव’ तत्व में राजनीति का माध्यम बन गया है जिसमें विभिन्न चैनल अपनी भूमिका इन्ज़ाइम के रूप में निभाते हैं | ख़बरों पर किये जा रहे प्रयोगों से यह ज़ाहिर होता है कि ख़बर का कोई निश्चित स्वरुप नहीं है लेकिन उसके बहुत ठोस कारण हैं और वह लगातार पकता हुआ माल है | जैसे कि एक कच्चा माल पकाने के लिए चुना गया हो और सब उसे अपना ही स्वाद देने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा कर रहें हों | कई बार इसका नतीजा यह भी होता है कि किसी बहुत ही संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता गुस्से में माइक छोड़ कर चले भी जाते हैं,ऐसे में मुद्दा तो बहुत पीछे छूट जाता है परन्तु ख़बर देखने वाले उनकी चिढ़ का भरपूर आनंद उठाते हैं | उन्हें भावों और उसके पीछे के तर्कों से कुछ भी लेना-देना नहीं होता | उनके मन में सच के प्रति कोई जिज्ञासा नहीं होती और वे उसमें मनोरंजन का तर्क ढूँढने लगते हैं | निर्णायक अवसरों पर तो ख़बरों को अक्सर हँसी-मज़ाक की ओर मोड़ दिया जाता है या फिर किसी के व्यक्तिव की ओर दर्शक का ध्यान आकर्षित कर दिया जाता है | हिंदी चैनलों के इतिहास में बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव इसका बेहद सशक्त उदाहरण हैं | मनोरंजन के मामले में खबरें कई बार सिनेमा तथा अन्य लोकप्रिय माध्यमों से प्रतिस्पर्धा करने लगती हैं | इसका अध्ययन ‘सास बहू और साज़िश’ तथा सिनेमा पर आधारित विभिन्न कार्यक्रमों के द्वारा किया जा सकता है, जो अन्य कार्यक्रमों के लिए अनदेखे पहलू वाले प्रोमोशन का काम करते हैं | सच कहा जाए तो ऐसे माहौल में दूरदर्शन की खबरें किसी रेस्तरां के व्यंजन-सूची सदृश दिखती हैं जो अपने तय समय पर परोसी जाती हों | इसमें संगीत और भिन्न ध्वनियों के मसालों का उपयोग हमारे स्वाद के लिए किया जाता है | कई बार तो एंकरिंग का तत्व भी कुछ इस प्रकार शामिल होता है जैसे कि वह ख़बर का आंतरिक हिस्सा हो और न कि प्रस्तुतकर्ता | अपराध से जुड़े समाचार-कार्यक्रमों में इनकी नाटकीयता समझने के लिए किसी विशेष प्रयत्न की आवयश्कता नहीं क्योंकि इसे सही मायने में संवाददाता नहीं बल्कि कोई अभिनेता प्रस्तुत करता है | ब्रेक पर जाने से पहले “आगे देखेंगे दिल्ली के ब्लेडमैन को कहाँ से मिला ब्लेड” की नाटकीय प्रस्तुति देने वाला एंकर अपनी ब्रांड-वैल्यू स्थापित करने के साथ यह कहना कभी नहीं भूलता कि उसका न्यूज़-चैनल ही घटना-स्थल पर पहुँचा सबसे पहले ! इस प्रकार देखें तो यह समझ प्रस्तावित होती है कि दूरदर्शन पर जो खबरें हमें मिलती हैं अपने मूल चरित्र में वे मनोरंजन तथा अचम्भे के तत्व का संचार अपने उपभोक्ताओं में करती हैं जिससे उनके पास संबद्ध विषय के मूल्याँकन का कोई अवसर नहीं बच पाता |

ख़बर और ध्वनि का जैसा आत्मीय संबंध पिछली पीढ़ियों में बना था अब वो विलुप्त दिखाई देता है क्योंकि एफ़.एम. ने समस्त ध्वनियों पर जो कब्ज़ा  किया है वो शुद्ध मनोरंजन, विज्ञापन लोकप्रिय संगीत और रोमांस को प्रतिष्टित करता है | इसके पास सही मायने में कोई ख़बर नहीं होती है लेकिन यह अक्सर अपने एंकर की योजना के आधार पर कुछ मुद्दों को मनोरंजन में परिवर्तित कर देता है | ख़बरों को प्रस्तुत करने में न तो इसकी दिलचस्पी है,न ही अभ्यास और संभवतः अब इस मामले में वह अपना आत्मविश्वास भी खो चुका है | एक रेडियो चैनल ‘ओये’ की तो यह स्थिति है कि वह अपना प्रचार ही ‘सबसे फ़िल्मी’ चैनल के रूप में करता है| ऐसे में उसके पास ख़बर का अर्थ ही उस मनोरंजनात्मक सूचना तक रह जाता है जो कि सिनेमा तथा स्टारों तक ही सीमित रहती है | वह अपनी चैटिंग में सिनेमा के फायदे तक गिना देने का मज़ाक कर जाता है | एफ़.एम. के एंकरों की एक यह ख़ासियत होती है कि अपने चैनलों के लिए वे एक विशिष्ट पात्र को प्रस्तुत करते हैं जो अक्सर मुद्दों पर बात तो करते हैं लेकिन इस प्रक्रिया में वे ख़बरों के साथ श्रोताओं का एक रोमान्टिक संबंध स्थापित करते हैं | मसलन, एक चैनल पर शैंकी-पैंकी आते हैं जो अपनी बातचीत के माध्यम से अक्सर ख़बरों को मनोरंजन और आकर्षण के अंतर्वस्तु में बदल देते हैं | दिल्ली मेट्रो में महिलाओं के लिए लगाए गए विशिष्ट कोच पर उनकी प्रतिक्रिया बेहद काल्पनिक है जिसमें वे उस कोच को एक गर्ल्स-होस्टल का दर्जा देते हुए यह सोच प्रसारित करते हैं कि उसके इर्द-गिर्द लड़को की भरमार लगी है और इस प्रकार वह एक रोमान्टिक स्पेस में परिवर्तित हो चुकी है | लेकिन इस पर सारगर्भित विचार और ज़िम्मेदार प्रतिक्रियाओं का अभाव लगातार बना रहता है | नेताओं की तो यह हालत है कि उनकी आवाज़ और शैली की नकल का कोई अंत नहीं है तथा इन आवाजों का उपयोग भी उनका मज़ाक ही बनाता है और वे कुछ भी बोल सकते हैं ! मिसाल के तौर पर भूतपूर्व क्रिकेट खिलाड़ी तथा लोकसभा सांसद नवजोत सिंह सिद्धू की मिमिक्री (नकल) में “ओये गुरु” के संवाद के साथ किसी भी मुद्दे को मज़ाक बना कर रख दिया जाता है | इससे मुद्दे की गम्भीरता तो खत्म होती ही है साथ में वह मनोरंजन हमें यह भुला देने का काम भी करता है कि उक्त व्यक्ति जनता के चुने हुए प्रतिनिधि भी हैं जिनसे आम नागरिक की हैसियत से हम गंभीर ज़िम्मेदारियों की अपेक्षा रखते हैं | कहने का मतलब यह कि उन की कोई छवि जनता के प्रतिनिधि की नहीं बनने दी जाती जिससे उनके असली काम पर ध्यान जाए ,वह तो एक मनोरंजनकर्मी तक सीमित कर दी जाती है | इसी प्रकार एक अन्य पात्र ‘चाचा बतोले’ जब चाहे तब यह घोषणा कर देते हैं कि प्रधानमंत्री ने उन्हें किसी मूर्खतापूर्ण मांग को पूरा करने के लिए फोन पर गुजारिश की है | यदि यह आम आदमी के प्रतिनिधि कि स्थिति है तो निश्चित ही यह अन्य ख़बरों के लिए खतरनाक है क्योंकि वह मनोरंजन का नहीं बल्कि विकास,राजनीति और जवाबदेही का मामला है ! इस प्रकार कि प्रस्तुति मनोरंजन नहीं करती बल्कि नागरिकता का ह्रास करती है | इसकी तुलना कार्टूनों में आये हुयी राजनीतिक घटनाओं से करें तो साफ़ पता चल जाएगा कि व्यंग करना विवेक की पहचान है न कि गैर-ज़िम्मेदार सम्प्रेषण के माहौल बनाने का है | लेकिन यहाँ तो मनोरंजन को बेचने के लिए भी कुछ भी सुनने को मिल सकता है जिसका असर जनता के मन पर राय बनाने में अवश्य पड़ेगा !

विभिन्न माध्यमों द्वारा अपनाई जा रही इस प्रकार की तकनीकों से यह तो स्पष्ट है कि हम ख़बर जैसी संस्था से लगातार दूर होते चले जा रहे हैं जिससे हमारे मत बनने-बनाने की प्रक्रिया पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं | माध्यमों द्वारा पैदा की जा रही इस दूरी से हमारा सामाजिक बोध निरंतर क्षीण होता चला जा रहा है जिसका लाभ निश्चित ही उन शक्तियों को मिलता हैं जो हमें लगातार मीठे नशे में बेसुध रखना चाहती हैं | विरोधभास तो यह है कि यह मिठास हमें कहीं न कहीं यांत्रिक भी बनाती हैं और हम एक भारतीय समाज के रूप में भी असंवेदनशील हो चले हैं | हमने लोकप्रियतावाद के कुचक्र में केवल कुछ मीठे मुहावरों में जीना सीख लिया है !

  

                                                   डॉ. अरुणाकर पाण्डेय कृत साभार

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