Monday, February 1, 2010

*** राष्ट्रवाद की अवधारणा


ष्ट्रवाद एक नितांत आधुनिक अवधारणा है। यह 'राष्ट्र-राज्य' की निर्मिति से जुड़ा है। एक निश्चित भूखंड एवं एक आम राजनीतिक एवं आर्थिक रूपवाली जनता के समुदाय के बीच 'एकत्व' के मनोवैज्ञानिक एहसास के साथ ही राष्ट्रीय पहचान अस्तित्व में आयी। एकत्व की यह प्रक्रिया जनता के आम रस्मों-रिवाज तथा परंपरा से और तीव्र हो गयी। पश्चिमी यूरोप में सामंती उत्पीड ना से मुक्ति का वायदा राष्ट्रवाद के उदय का कारण था।

राष्ट्रीयता मूलतः पूँजीवादी समाज-व्यवस्था का ही लक्षण है। 19वीं सदी को 'राष्ट्रवाद का युग'1 माना जाता है। इस समय प्रत्येक राज्य 'राष्ट्र-राज्य' की आधार-भूमि पर खडे होते हैं और यह धारणा बलवती होती है कि 'प्रत्येक राष्ट्रीयता का अपना अलग राज्य होना चाहिए।2 मध्य युग में सभ्यता का निर्धारक तत्व धर्म था, राष्ट्रीयता नहीं। 'राष्ट्रवाद को आधुनिकतावाद और उसके परिणामों के समरूप समझा जाता रहा है। इस अर्थ में यह पुरानी व्यवस्था को भंग करने वाली शक्ति है। इसका कारण या तो आधुनिक युग के विकास का सूत्रपात करने वाले विचारों का प्रसार हो सकता है या उन परिस्थितियों का प्रसार, जिन्हें आधुनिकतावाद से सम्बद्ध किया जाता है, अर्थात् साक्षरता का प्रसार, मुद्रा की अर्थव्यवस्था, बढते हुए संचार माध्यम और नगरों का विकास।3 पश्चिमी देशों में राष्ट्रवाद को ऐसी धारणाओं का समूह माना गया जिनमें मूल विचार राष्ट्र-राज्य पर केन्द्रित है। इसलिए राष्ट्रवाद का अध्ययन, मुखयतः 'किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के समूह के विचारों का, अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों तक पहुंचने की प्रक्रिया का अध्ययनरत है।'4 राष्ट्रवाद का संबंध राष्ट्र के स्वरूप से है। मध्य-युग में राजनीतिक निष्ठा (Political Allegiance) धर्माधारित था। राष्ट्र एक आधुनिक अवधारणा है। यह 'आधुनिक पूँजीवाद, औद्योगिकरण, जन-संचार माध्यम और धर्मनिरपेक्षता'5 का परिणाम है।

राष्ट्र (नेशन) के लिए 'हिन्दी-बाँगला के परिचित पुराने शब्द जाति'6 का प्रयोग करना अधिक उचित है। प्रजातीय एकता का आधार नस्ल की शुद्धता है जो वर्तमान युग में संभव नहीं। जातियाँ एक-दूसरे से घुलमिल जाती हैं। कहा जा सकता है कि 'जाति (राष्ट्र) वह मानव-समुदाय है जो व्यापार द्वारा पूंजीवादी संबंधों के प्रसार के साथ गठित होती हैं। सामाजिक विकास-क्रम में मानव समाज पहले जन या गण के रूप में गठित होता है। सामूहिक श्रम और सामूहिक वितरण गण समाज की विशेषता है और उसके सदस्य आपस में एक-दूसरे से रक्त-संबंध के आधार पर सम्बद्ध माने जाते हैं। इन गण समाजों के टूटने पर लघु जातियाँ बनती हैं जिनमें उत्पादन छोटे पैमाने पर होता है और नये श्रम-विभाजन के आधार पर भारतीय वर्ण-व्यवस्था जैसी समाज-व्यवस्था का चलन होता है। पूँजीवादी-युग में इन्हीं लघु जातियों से आधुनिक जातियों का निर्माण होता है।'7 इसलिए प्रजाति की शुद्धता या समान भाषा, धर्म व संस्कृति को राष्ट्र-निर्माण का आधार नहीं माना जा सकता।

यूरोपीय इतिहास में 1815-1848 के समय का विशेष महत्व है। इस समय यूरोप में जो राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था लागू थी वह तेजी से बदलते हुए समाज के लिए अपर्याप्त थी। रूढ़िवादी शक्तियाँ जन-आन्दोलनों को समाप्त करने के पक्ष में थी। शक्तिशाली होने के बावजूद पुराना समाज, जिसके मुख्य तत्व राजा, अभिजात वर्ग, तथा चर्च थे, अधिक समय तक इन शक्तियों का सामना नहीं कर सकता था। इस पृष्ठभूमि में राष्ट्रवाद का उदय माना जाता है। फ्रांसीसी क्रांति में लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद का बीज निहित है। 'वह मानव-समुदाय, जिसके अपने प्रतिनिधि हों तथा अपने बनाये गये विधानों से शासन चलाते हैं -- राष्ट्र है'।8 इस अर्थ में राष्ट्र एक राजनीतिक-वैधानिक संस्थान है जो अपनी जनता (या नागरिक) के प्रति जिम्मेवार है। ऐसा माना गया कि लोकतांत्रिक विकास को एक अवस्था में राज्य स्वयं ही राष्ट्र बन जाते हैं। इस अर्थ में राज्य का प्रत्येक नागरिक (या प्रजाजन) राष्ट्रीयता की परिधि में आ जाता है - चाहे उसकी भाषा कुछ भी हो या उसकी वंश-परंपरा का उद्भव कहीं से हो। 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में जर्मन लेखकों ने राष्ट्र को भाषा एवं संस्कृति से जोड़कर परिभाषित किया है। इनके लिए राष्ट्र 'ईश्वर और प्रकृति द्वारा निर्धारित वास्तविकता है'।9 चूंकि भाषा परंपराओं तथा भावनाओं को सुरक्षित करती है, भावात्मक बंधनों, मिथकों आदि को संचारित करती है। अतः 'एक निश्चित भूखंड में रहने वाले लोग एक समान भाषा द्वारा एक समान संस्कृति का निर्माण व विकास करते हैं'।10

राष्ट्रीयता की यह अवधारणा, राष्ट्र को आध्यात्मिक तत्ववाद से मिला देता है। इसमें प्रत्येक राष्ट्र एक पवित्र संगठन या संस्थान है। जर्मन भाववादियों के लिए राष्ट्र एवं जाति में कोई फर्क नहीं रहा एवं 'राष्ट्रवाद मानवता का प्राकृतिक धर्म हो गया'11। जर्मन भाववादियों की इस धारणा में हिटलर के नस्लवाद का बीज देखा जा सकता है। इनका राष्ट्र एक 'विशिष्ट राष्ट्र' है जो दुनिया के किसी भी राष्ट्र से विशिष्ट है। अपनी इसी विशिष्टता को जर्मनों ने श्रेष्ठता में बदलकर सम्पूर्ण विश्व को युद्ध की अग्नि में झोंक दिया। भाषा और संस्कृति आधारित राष्ट्र की अवधारणा को इर्नस्ट रेनन ने 1882 में अपने एक व्याखयान में चुनौती दी। उनके अनुसार भाषायी तथा जातीय समूह को आधार बनाने पर राष्ट्र को नहीं समझा जा सकता। 'समान प्रजाति, भाषा, धर्म, समान आर्थिक हित या भौगोलिक'12 तथ्यों द्वारा राष्ट्र को पूर्ण रूपेण परिभाषित नहीं किया जा सकता है। रेनन के अनुसार 'समान इतिहास, विशेष तौर पर समान सुख-दुख, पीडा आदि में सहभागिता एवं समान स्मृतियां जिन पर समान रूप से सहानुभूति तथा स्वाभिमान हो, राष्ट्र का विकास होता है।'13 इस प्रकार रेनन, एक साथ रहते हुए विकासित समान परंपराओं को राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण मानते हैं। जब कोई मानव समुदाय एक समान परंपरागत प्रतीकों से संबद्ध हो और एक-दूसरे को सहयोगी मानने लगे, जिम्मेवारी का एहसास करे, तब राष्ट्र की अवधारणा अस्तित्व में आती है। रेनन राष्ट्र के विकास को प्रक्रिया तो बतलाते हैं, लेकिन अपने पूरे व्याखयान में वे यह नहीं बतलाते कि मानव समुदाय एकत्र किस आधारभूत कारणों से होते हैं।

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1. Encyclopedia Britanica Voll.16, 1968
2. वही
3. अल्पविकास की राजनीति, पृ० 15
4. नेशनलिज्म : ए रेलिजन (न्यूयार्कः मैकमिलन 1960, हैस कोहनः द रज ऑफ नेशनलिज्मः दि फस्ट इंज ऑफ ग्लोबल हिस्ट्रीः न्यू० हॉपेरं एंड रो 1962)
5. नेशन एण्ड नेशनलिज्म इन ग्लोबल एरा, 29
6. भारतीय साहित्य के इतिहास की समस्याएं, 14
7. वही, 27-28
8. The Encyclopedia of Philosophy - Voll. 5 and 6
9. नेशन एण्ड नेशनलिज्म इन ग्लोबल एरा, 30
10. वही
11. वही
12. The Encyclopedia of Philosophy - Voll. 5 & 6
13. वही
14. Theories of Nationalism - P-42
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डॉ. अनिल कुमार से साभार

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