Tuesday, June 30, 2009

द्वन्द्व की संकल्पना

सामान्यता द्वन्द्ववाद, द्वन्द्वात्मकता या द्वन्द्वात्मकवाद जैसे शब्दों का प्रयोग होता है। द्वन्द्ववाद या द्वन्द्वात्मकता अंग्रेजी भाषा के डायलेक्टिक्स शब्द के अर्थ में इस्तेमाल होता है। यह शब्द भी यूनानी दियो-लोग शब्द से आया है, जिसका अर्थ है द्वि-संवाद; दो आदमियों का प्रश्नोत्तर। दूसरी तरफ डायलेक्टिक्स का दर्शन में जिस अर्थ में प्रयोग होता है, वह डायलाॅग का लाक्षणिक (मुख्य नहीं) अर्थ है; और ‘वादे-वादे जायते तत्वबोधः’ (वाद-2 करते हुए तत्वबोध होता है) के अर्थ में ज़्यादा आता है। किसी भाषण में द्वन्द्ववाद वह प्रक्रिया व तरीका है जिसमें दो परस्पर विरोधी मतों के संघर्ष के बाद हम सत्य तक पहुँचते हैं। प्रकृति में द्वन्द्ववाद का अर्थ है, अपने भीतरी विरोधी स्वभाव के द्वन्द्व से प्रकृति का एक तीसरे रूप में विकसित होना। जैसे, हाइड्रोजन के प्राणपीड़क तथा आक्सीजन के प्राणदायक तत्वों से तीसरे तत्व जल का निर्माण होता है। विचार क्षेत्र में इस प्रक्रिया का अर्थ है, दो विरोधी विचारों के द्वन्द्व से तीसरे विचार पर पहुँचना।1 द्वन्द्व के इस क्रम को परखने की प्रक्रिया भी द्वन्द्वात्मक होती है।

द्वन्द्व की मूलभूत संकल्पना सबसे पहले हेगेल ने दी थी। द्वन्द्ववाद के प्रमुख नियमों तथा संवर्गों की स्थापना और उनकी विशद् व्याख्या हेगेल की सबसे बड़ी देन है। हेगेल ने निश्चित रूप से यह विचार प्रकट किया कि संसार में द्वन्द्वात्मक संबंध तथा पारस्परिक निर्भरता सर्वत्र व्याप्त है। हेगेल के द्वन्द्ववाद के तीन प्रमुख आयाम हैं-

 (1) प्रतिपक्षों की एकता और संघर्ष का नियम,
(2) मात्रा के गुण में संक्रमण का नियम, और
(3) निषेध के निषेध का नियम।

 विकास की अवधारणा का मूलाधार इन्हीं तीन नियमों में देखा जा सकता है। हेगेल निषेध या असंगति (negation or contradiction) को विकास की प्रेरक शक्ति स्वीकार करते हैं। समूचा विश्व इसी कारण अवस्थित और सक्रिय है। उन्हें ‘विश्व का प्राण’ माना जा सकता है। उनके अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु विरोधी धर्मों को अपने भीतर निहित किए होती है। ये विरोधी धर्म ही विकास को गति देते हैं और उसे संभव बनाते हैं। यह विकास त्रिस्तरीय आयामों पर आधारित होता है, जिसे हेगेल ने पक्ष (Thesis), प्रतिपक्ष (Anti-thesis) तथा संश्लेष (Synthesis) के द्वारा व्याख्यायित किया है। इसे ‘वाद-विवाद-संवाद’ के रूप में भी जाना जाता है। पक्ष में ही प्रतिपक्ष निहित रहता है, फलस्वरूप असंगति के कारण तीसरी स्थिति संश्लेष या समन्वय के रूप में स्पष्ट होती है। संश्लेष की स्थिति आ जाने के पश्चात् पुनः अंतर्विरोध जन्म लेते हैं; और पक्ष-प्रतिपक्ष तथा संश्लेष का क्रम फिर चलता है, और तब तक चलता रहता है, जब तक अपूर्णता की स्थिति समाप्त न होकर पूर्ण प्रत्यय या परम प्रत्यय की स्थिति नहीं आ जाती। हेगेल इस समूचे विकास का लक्ष्य विश्वात्मा की प्राप्ति मानते हैं, और यही उनके द्वन्द्ववादी चिंतन का भाववादी आधार है। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि समन्वय या संश्लेष की स्थिति आ जाने पर प्रारंभिक पक्ष और प्रारंभिक प्रतिपक्ष विनष्ट नहीं हो जाते, वस्तुतः अपने विरोध को खोकर दोनों इस समन्वय या संश्लेष का अंग बन जाते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस तीसरी स्थिति में विकास का जो रूप सामने आता है, वह प्रथम दो की तुलना में उन्नत होता है। यही मात्रा या परिमाण का गुण में संक्रमित होता है।2 यहाँ यह भी ध्यान रखने की ज़रूरत है कि उन्नति हमेशा सकारात्मक ही नहीं होती, इसका परिणाम नकारात्मक भी हो सकता है। सकारात्मकता और नकारात्मकता की समझ भी द्वन्द्वात्मकता की अगली परिणति पर ही स्पष्ट हो पाती है। द्वन्द्वात्मकता की इन भौतिक वास्तविकताओं पर हेगेल के बाद कार्ल मार्क्स पहुँचते हैं। मार्क्स ने भाववादी आवरण को उतारकर, विज्ञान के नव्यतम संदर्भों से उसे जोड़ा, उसे एक भौतिकवादी अध्ययन पद्धति के रूप में प्रतिष्ठित किया।

मार्क्स ने लिखा - ‘‘मेरी द्वन्द्वात्मक प्रणाली हेगेल से मूलतः भिन्न ही नहीं, वरन् उसके ठीक उलटी दिशा में है। हेगेल के अनुसार वास्तविक जगत् का निर्माण चिंतन-क्रिया की प्रेरक शक्ति से हुआ है। विचार-क्रिया को विचार तत्व का नाम देकर वह उसके स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार करता है। वह कहता है कि यह ‘विचार-तत्व’ ही वास्तविक जगत् का निर्माण करता है। हेगेल के लिए, वस्तु-जगत्, विचार-तत्व का ही बाह्य घटनात्मक रूप है। इसके विपरीत मेरी दृष्टि से विचार, मानव-चित्त में प्रतिबिम्बित भौतिक संसार के सिवा और कुछ नहीं है। वह चिंतन क्रिया में भौतिक संसार का रूपान्तरण है।’’3 मार्क्स का यह सिद्धांत पराभूतवादी चिंतन से भिन्न और बिल्कुल उलट रूप में भौतिकवादी है। पराभूतवाद के प्रतिकूल, द्वन्द्ववाद का सिद्धांत है कि प्रकृति के सभी बाह्य रूपों और पदार्थों में अंतर्विरोध सहज रूप से विद्यमान रहते हैं। इन पदार्थों और रूपों के भाव-पक्ष और अभाव-पक्ष दोनों हैं। उनका अतीत है तो अनागत भी। एक अंश मरणशील है तो दूसरा विकासोन्मुख है। इन दो विरोधी अंशों का संघर्ष, पुरातन और नवीन, मरणशील और विकासोन्मुख, नाश और निर्माण का संघर्ष ही, विकास-क्रम की आंतरिक प्रक्रिया है। इसलिए द्वन्द्वात्मक प्रणाली के अनुसार निम्न से ऊर्ध्व का विकास इस क्रम में नहीं होता है कि प्रकृति के स्तर, एक के बाद एक सहज गति से खुलते जायें। इसके प्रतिकूल, विकास-क्रम में पदार्थों और प्रकृति के बाह्य रूपों में सहज रूप से विद्यमान असंगतियाँ खुलती जाती है। इन असंगतियों के आधार पर जो विरोधी प्रवृत्तियाँ क्रियाशील हैं, का यह कहना बिल्कुल ठीक है कि ‘‘मानव को गतिशील करनेवाली हर चीज़ का उसके मस्तिष्क से होकर गुज़रना अनिवार्य है; किन्तु वह चीज़ मानव मस्तिष्क में कौन-सी शक्ल अख़्तियार करेगी, यह बहुत कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करता है।’’4

मनुष्य परिस्थितियों का निर्माता भी होता है, और परिस्थितियों से मज़बूर भी। परिस्थितियों के निर्माणकार्य में एक मनुष्य की भूमिका भी प्रभावी हो सकती है, और समुदाय की भी। इसकी प्रक्रिया सरल नहीं द्वन्द्वात्मक होती है। दरअसल द्वन्द्व मूलतः एक गतिशील प्रक्रिया है, इसलिए इसका परिणाम भी गत्यात्मक है। इसे समझने के लिए चिंतन का आधार प्रकृति के संदर्भ में ही सजग होता है। ऐंगेल्स का कहना ठीक है कि ‘‘द्वन्द्ववाद की परख की कसौटी प्रकृति है, और आधुनिक प्रकृति विज्ञान के बारे में यह कहना निहायत ज़रूरी है कि उसने इस कसौटी पर परखने के लिए अत्यधिक प्रचुर तथा दिन-प्रतिदिन बढ़ती हुई सामग्री उपलब्ध करायी है, और इस प्रकार यह सिद्ध कर दिया है कि अंतिम विश्लेषण में प्रकृति की प्रक्रिया द्वन्द्वात्मक है।’’5

विज्ञान ने इस द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया को स्पष्ट करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अकारण नहीं है कि यह द्वन्द्ववाद आइंस्टीन की उस खोज में भी जारी रहता है, जिसमें उन्होंने सिद्ध किया कि द्रव्यमान को उर्जा में बदला जा सकता है। इसी प्रकार डार्विन का क्रमिक विकास का सिद्धांत द्वन्द्वात्मक और भौतिकवादी है। विज्ञान का अध्ययन केन्द्र व्यापक है। इलेक्ट्रान, परमाणु-नाभिक, कर्म क्वांटम ही इसके क्षेत्र नहीं हैं; प्रकृति, मनुष्य, समाज, विचार, सभ्यता और संस्कृति भी इन्हीं से जुड़े हैं। द्वन्द्वात्मकता की परख का मूलाधार विज्ञान ही है।

दूसरी तरफ सहज ही देख सकते हैं कि पराभूतवादी चिंतन का आधार सनातनपंथी, नियतिवादी दृष्टिकोणों पर आधारित है। जबकि द्वन्द्ववाद, मूर्त चिंतन और वस्तुगत यथार्थ को समग्रता में समझने का तकाज़ा करनेवाले ज्ञान का सैद्धांतिक आधार हैं।6 मारिस काॅर्नफोर्थ के शब्दों में कहें तो ‘‘पराभूतवाद के मुकाबले द्वन्द्ववाद का उद्देश्य है कि विश्व में वास्तविक परिवर्तनों व अंतर्सम्बन्धों का पता लगाना और वस्तुओं के बारे में सदैव उनकी वास्तविक गति और अंतर्सम्बन्धों को ध्यान में रखकर सोचना।’’7

इस विश्व में प्रकृति और मनुष्य अलग नहीं हैं, दोनों अटूट रूप से जुड़े हैं। लेकिन दोनों की द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया समान नहीं है। प्रकृति के इतिहास और मनुष्य के इतिहास एक जैसे नहीं हैं। इसीलिए इतिहास का अध्ययन सिर्फ ऐतिहासिक भौतिकवाद के आधार पर होता है, जबकि मनुष्य के इतिहास का अध्ययन ऐतिहासिक और द्वन्द्वात्मक दोनों तरह के भौतिकवाद पर आधारित होता है। प्रकृति और मानवीय समाज, दोनों की गतिशीलता अनिवार्यतः द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया में ही है, लेकिन दोनों के द्वन्द्वात्मक अंतर्विरोध एक जैसे नहीं होते। अकारण नहीं है कि मानवीय संघर्ष और प्राकृतिक संघर्ष एक से नहीं हैं। गतिशीलता और परिवर्तनशीलता (द्वन्द्वात्मकता) के होने पर भी स्वरूप व भंगिमा, परिस्थिति और परिवर्तन एक जैसे नहीं होते। उनमें विविधता हो सकती है। जीवजगत् और जीवेत्तर जगत इनकी परिवर्तनशीलता में बड़ा फर्क है। पशु जगत् और मानव समाज इनकी परिवर्तनशीलता में बड़ा फर्क है। मानव उत्पादक है, मानवेत्तर जीव उत्पादक नहीं है। उत्पादकता सिर्फ संतानोत्पत्ति नहीं होती। इसीलिए मानवता का विकासक्रम मानवेत्तर विकासक्रम से भिन्न है।

प्रकृति भी सर्वत्र एक-सी नहीं होती, न उनके अंतर्विरोध एक-से होते हैं। धरती पर आक्सीज़न है, वातावरण है; चंद्रमा पर आक्सीज़न नहीं है, वातावरण नहीं है। दोनों जगह एक से अंतर्विरोध नहीं हैं, एक-सी गति नहीं है, परिवर्तन के एक-से नियम नहीं हैं।8 इसीलिए जार्ज लुकाच का यह कहना बिल्कुल सही है कि ‘‘भौतिकवादी द्वन्द्ववाद एक क्रांतिकारी द्वन्द्ववाद है। यह परिभाषा इसकी प्रकृति को समझने के लिए इतनी अहम् और कुल मिलाकर इतनी नाजुक है कि अगर समस्या को सही ढंग से उठाया जाना है, तो इससे पहले कि हम द्वन्द्ववादी पद्धति की किसी विवेचना की हिम्मत करें, हमें इसी को पूरी तरह समझना होगा।’’9

प्रकृति, मनुष्य, समाज, सभ्यता और संस्कृति सभी द्वन्द्वात्मक क्रम में होते हैं। यह संसार तैयार हो चुकी सामग्रियों का भंडार न होकर, प्रक्रियाओं का भंडार है, और ये प्रक्रियाएँ अपने स्वरूप में अनंत विविधता से भरी हुई हैं। यह विविधता अपने स्वरूप में कितनी भी व्यापक क्यों न हो, एक बात तो पहली ही नज़र में स्पष्ट हो जाती है कि ये समस्त प्रक्रियायें किसी न किसी निश्चित एवं स्थायी संबंधों में बंधी रहती है। कोई भी प्रक्रिया अपने में पूर्ण निरपेक्ष या स्वतंत्र नहीं है। संसार का समूचा क्रम कुछ निश्चित नियमों में बंधा हुआ ही अपनी गतिशीलता का परिचय देता है। प्रक्रियाओं की यह परस्पर सम्बद्धता, निश्चित नियमों में बंधा संसार का यह गतिचक्र, मानव की अपनी इच्छा या मस्तिष्क से पूर्णतः स्वतंत्र है। यही नहीं, सृष्टि की प्रत्येक वस्तु तथा प्रत्येक क्रिया, दूसरी वस्तु तथा क्रियाओं को एक स्तर पर प्रभावित करती है, दूसरे स्तर पर उनसे प्रभावित भी होती है।

जितना सत्य विश्व की सतत् गतिशीलता एवं परिवर्तनशीलता है, उतना ही सत्य यह तथ्य भी है कि विश्व सतत् विकासशील भी है। गति, परिवर्तन और विकास सृष्टि में अंतर्निहित हैं, जिन्हें कोई नहीं बदल सकता। दरअसल गतिशीलता और विकासशीलता समानार्थी नहीं है। उदाहरण के लिए पेड़ के तने से बनी एक कुर्सी की गतिशीलता धीरे-धीरे उसे नष्ट कर देती है। इस गति को विकास नहीं कह सकते। लेकिन जब कोई बीज ज़मीन के नीचे से गतिशील होकर बड़ा होता है और पेड़ बनता है तो यह गति विकास है। पानी से बर्फ़ बनना और फिर बर्फ़ से पानी बनना, ये दोनों गति विकास है। लेकिन पशु से मनुष्य बनना तदनन्तर मनुष्य से पशु बनना ये दोनों गति विकास नहीं हैं। गुणात्मक परिवर्तन हमेशा विकास नहीं होते।

हर विकासशील वस्तु अपने भीतर अपने प्रतिपक्ष को भी समाहित किये हुए होती है, जो इसे पूर्व-स्थिति में नहीं रहने देता। पक्ष और प्रतिपक्ष का पारस्परिक संघर्ष भीतर ही भीतर चलता रहता है, और तब तक चलता रहता है जब तक अंतर्विरोध शांत नहीं हो जाते और वस्तु एक नए गुणात्मक विकास को नहीं सूचित करने लगती। यह क्रम चलता रहता है। सृष्टि का समूचा विकास क्रम अंतर्विरोधों और विपरीतों के इसी संघर्ष का परिणाम है, जो सतत् चलता रहता है। इसीलिए ऐंगेल्स ने लिखा है कि ‘‘छोटी से छोटी चीज़ से लेकर बड़ी से बड़ी चीज़ तक, बालू के कण से लेकर सूरज तक, लघुतम जीव कोष से लेकर मनुष्य तक, सम्पूर्ण प्रकृति सतत् गतिमय और परिवर्तनशील है। उसकी स्थिति निर्माण और निर्वाण के अविराम प्रवाह में है।’’10

दूसरी तरफ विकास की प्रक्रिया द्वन्द्वात्मकता के कारण भी अधिक जटिल है। इसलिए द्वन्द्वात्मक प्रणाली के अनुसार विकासक्रम का यह अर्थ नहीं है, कि जो पहले हो चुका है, अब वही सीधे-सीधे दोहराया जाए। विकास कोल्हू के बैल की तरह एक ही जगह चक्कर खाने का नाम भी नहीं है। विकास की गति ऊर्धोन्मुखी और अग्रसर होती है। विकास पहली की गुणात्मक परिस्थिति से दूसरी गुणात्मक परिस्थिति तक संक्रमण का नाम है।11 लेनिन के शब्दों में-‘‘विकास, जो एक ही दिशा में अपने क्रम को दुहराता प्रतीत होता है, जबकि वस्तुतः उसका यह आवर्तन-प्रत्यावर्तन सदैव एक उच्च धरातल की ओर होता है (निषेध का निषेध)। विकास, जो सीधी लकीर में न होकर घुमावदार तरीके से होता है। विकास, जिसके क्रम में छलांग, दुर्गतियाँ, क्रांतियाँ आती हैं। विकास, जिसकी निरंतरता व्याघातों द्वारा खण्डित होती है, जो परिमाण से गुण में रूपांतरित होता है। विकास, जिसके विरोधी तत्वों की असंगतियाँ परस्पर अंतग्र्रथित और एक-दूसरे पर आधारित रहते हैं। और अंततः विकास, जिसमें परस्पर सम्बद्ध सभी पक्ष गति की एक नियमानुशासित, समान तथा सार्वत्रिक प्रक्रिया को सूचित करते हैं। द्वन्द्ववाद के कुछ ऐसे विशिष्ट मुद्दे हैं जो विकास को अब तक सर्वाधिक सम्पन्न सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।’’12 तय है कि परिमाण सम्बन्धी विकास से गुण सम्बन्धी विकास तक के संक्रमण का नाम द्वन्द्वात्मक विकास है।

द्वन्द्व की प्रक्रिया गति पैदा करती है, और गति के बग़ैर विकास संभव ही नहीं। कह सकते हैं कि द्वन्द्व, विकास की मूल शर्त है। इस संदर्भ में यह समझना ज़रूरी है कि विकास, वृद्धि की महज एक सरल प्रक्रिया नहीं होता, बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया होता है जो मात्रात्मक परिवर्तनों से गुजरता हुआ प्रकट बुनियादी परिवर्तनों तक पहुँचता है।

अक्सर पक्ष भलाइयों का होता है और प्रतिपक्ष बुराइयों का। लेकिन जब पक्ष से बुराई हो तो प्रतिपक्ष में भलाइयाँ नज़र आती है, तब ऐसे में याद रखना चाहिए कि संश्लेष इसके द्वन्द्वात्मक परिणाम होते हैं। दरअसल हर प्रपंच के भीतर दो ही अंश नहीं होते, उसके दो ही पक्ष नहीं होते। अनेक अंश, अनेक पक्ष हो सकते हैं और परस्पर विरोधी होने के अलावा वे एक दूसरे के पूरक भी हो सकते हैं।13

किसी भी व्यक्ति के जीवन का क्रम अनिवार्यतः द्वन्द्वात्मक ही होता है। इसे कई संदर्भों में समझा जा सकता है। जैसे, मनुष्य में कुछ गलतियाँ सहज रूप से गतिशील रहती है। अचानक गलतियों का अहसास होता है, फिर उन गलतियों को दूर करने का प्रयत्न होता है। तदनन्तर नये तरह की कार्यपद्धति शुरू होती है। ये पूरी प्रक्रिया द्वन्द्वात्मक ही है। इसीलिए यह कहना उचित है कि ‘‘मनुष्य सृष्टि की एक विशिष्ट रचना है। पृथ्वी पर उसकी जीवन-यात्रा रहस्य और रोमांस से भरी एक साहस-कथा है। उसकी कहानी सतत् संघर्ष और महान् उपलब्धियों की कहानी है।’’14 सांस्कृतिक हो, सामाजिक या वैचारिक हो, सारी पद्धतियाँ द्वन्द्वात्मक क्रम में परिवर्तित होती है। परिवर्तन का स्वरूप कुछ भी हो सकता है। इन्हें विकास भी कह सकते हैं, विनाश भी कहा जा सकता है।

प्राचीन सभ्यता और आधुनिक सभ्यता का अंतर भी द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया का ही परिणाम है। गति और परिवर्तन दोनों एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े रहते हैं। संस्कृति को भी द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया से अलग नहीं देखा जा सकता। संस्कृति का संबंध मानवीय व्यवहार से है, जिसका स्वरूप सरल नहीं, जटिल है। ‘‘मानवीय व्यवहार का अध्ययन उस पद्धति से नहीं कर सकते जिससे प्रकृति का किया जाता है।’’15 दोनों की द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया भिन्न है। दरअसल जिसे हम मनुष्य का व्यवहारिक जीवन कहते हैं, वह निरन्तर सांस्कृतिक व्यक्तित्व से प्रभावित एवं गठित होता रहता है। वस्तुतः सांस्कृतिक जीवन में लगातार उपयोगी एवं निरुपयोगी तत्वों की क्रिया-प्रतिक्रिया होती रहती है। एक ही ज़रूरत कई तरह से पूरी की जा सकती है।16 इसी क्रम में चिंतन, व्यवहार और विकास का स्वरूप बदलता है। सामाजिक विकास में गुणात्मक परिवर्तन सम्पूर्ण और निरपेक्ष नहीं होता, पुरानी स्थिति के अवशेष कायम रहते हैं। आदिम साम्यवाद के बाद गोत्रों वाला संगठन खत्म हो जाना चाहिए, लेकिन बहुत जगह नहीं हुआ।

विकास के अनेक कारण होते हैं, समाज के भीतर और बाहर के अंतर्विरोध अनेक प्रकार के होते हैं। ये सभी कारण एक साथ हर समाज में केन्द्रीभूत नहीं होते। इसलिए कुछ सामान्य बातों के अलावा विकास के रूप अलग-अलग होते हैं। इस परिचर्चा में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह भी उठता है कि जब परिवर्तन होना प्रकृति का नियम है, और विकास और विनाश इसके साथ स्वभावतः जुड़े हैं तो मनुष्य क्रांति या संघर्ष क्यों करे? ऐसे में यह ध्यान रखना चाहिए कि सामाजिक तथा राजनीतिक आंदोलन या क्रांतियाँ मनुष्य इसलिए करता है, ताकि उसके विकास का स्वरूप, उसकी प्रक्रिया में परिवर्तन के क्रम को न केवल तीव्र कर सके, बल्कि इच्छित परिणाम भी प्राप्त कर सके।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि द्वन्द्वात्मक प्रणाली की चार प्रमुख विशेषताएँ हैं। पहली यह कि किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना या विचार को अन्य वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं और विचारों के अविभाज्य प्रसंग में देखना है। दूसरी विशेषता है, वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं और विचारों को गतिशील, परिवर्तनशील और क्रमबद्ध रूप में देखना। घटनाओं के सजीव संबंध का अर्थ ही यह है कि सम्बन्ध अस्थिर नहीं है। हिन्दी साहित्य के विभिन्न युग और व्यक्तियों के संबंधों में एक क्रम है, यह क्रम केवल कालानुक्रम ही नहीं है। इस क्रम में आंतरिक विकास की गति का पता चलता है। क्रमिकता गति से ही सम्भव है और गति का स्पष्ट अर्थ है उद्भव और नाश की कड़ी। तीसरी विशेषता है, विकासक्रम को ऊर्धोन्मुख और अग्रसर रूप मंे देखना। विकास का अर्थ पुनरावृत्ति अथवा वृत्तिकार परिक्रमा नहीं है। यह ऊर्धोन्मुख विकास-क्रम सोद्देश्य है और निश्चित लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। चैथी विशेषता है, वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं और विचारों में असंगति अथवा अंतर्विरोध की पहचान। इसके बगैर भविष्योन्मुख विकास के स्वरूप के लिये कोई भी भूमिका निभाना संभव नहीं है।






1. राहुल सांकृत्यायन, वैज्ञानिक भौतिकवाद, पृ॰ 123-124.
2. शिवकुमार मिश्र, माक्र्सवादी साहित्य चिंतन, पृ॰ 15-16.
3. स्टालिन, द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद, अनु. केशव देव, पृ॰ 3 से उद्धृत.
4. ऐंगेल्स, मार्क्स/ऐंगेल्स संकलित रचनाएँ, खण्ड-3, भाग-2, पृ॰ 252.
5. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद, मारिस काॅनफार्थ, अनु. आनन्द अग्निहोत्री के पृ॰ 128 से उद्धृत.
6. बी. अदोरात्स्की, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद, पृ॰ 47,
7. मारिस काॅनफार्थ, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद, पृ॰ 54.
8. रामविलास शर्मा, मार्क्स और पिछड़े हुए समाज, पृ॰ 521-527 में इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी देखी जा सकती है।
9. ग्यार्ग लुकाच, इतिहास और वर्ग चेतना, पृ॰ 58.
10. द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद, स्टालिन, पृ॰ 5 से उद्धृत.
11. वही, पृ॰ 6.
12. माक्र्सवादी साहित्य चिंतन, शिवकुमार मिश्र, पृ॰ 43 से उद्धृत.
13. रामविलास शर्मा, मार्क्स और पिछड़े हुए समाज, पृ॰ 281.
14. श्यामाचरण दुबे, परम्परा, इतिहास-बोध और संस्कृति, पृ॰ 149.
15. डा. देवराज, संस्कृति का दार्शनिक विवेचन, पृ॰ 12.
16. वही, पृ॰ 174-175.

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