Sunday, May 10, 2009

*** सामंतवाद

सामंतवाद को मुख्यतः यूरोपीय संदर्भ में ही परिभाषित किया गया है। यूरोपीय सामंतवाद की बुनियादी विशेषताओं के बारे में मार्क ब्लाख का शास्त्रीय वर्णन हर किसी को ज्ञात है। सामंतवाद के स्वरूप को रेखांकित करते हुए उन्होंने लिखा, ‘‘एक पराधीन कृषक वर्ग, सेवा लघु भूखंड का (अर्थात् फीफ) का वेतन के स्थान पर उपयोग क्योंकि वेतन का कोई सवाल ही नहीं उठता; विशेषीकृत योद्धाओं के एक वर्ग की सर्वोच्चता; संरक्षण और आज्ञाकारिता के अंतर्गत बंधन, जिन्होंने एक विशिष्ट स्वरूप ग्रहण किया, जिसकों भृत्यता (बेसलेज) कहते थे; सत्ता का विखंडन, जो अनिवार्य रूप से अव्यवस्था की ओर ले जाता था; और इन सभी के बीच में समुदाय के अन्य स्वरूपों, परिवार और राज्य के अस्तित्वों का कायम रहना, जिनमें राज्य ने द्वितीय सामंती युग में पुनर्नवीकृत शक्ति को प्राप्त कर लिया; यूरोपीय सामंतवाद की ऐसी ही आधारभूत विशेषतायें दृष्टिगोचर होती है।’’36

इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका ने इसे अधिकारों और कर्तव्यों की एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था कहा है जो सामंतशाही और भृत्यता के संबंधों पर आधारित है।37 तदनंतर ‘प्रभु और भृत्य’, ‘सेवा लघु भूखंड’, ‘वश्यता-स्वीकृति’, ‘कर्तव्य और अधिकार’, ‘विधि वेत्ताओं की व्यवस्था’, जैसे पाँच Feodo-Vassalitic institutions के संदर्भों में सामंतवाद को व्याख्यायित किया है।38

स्ट्रेयर ने इसे शासन की प्रणाली (Method of Government) के रूप में देखा। इस शासन के स्वरूप को समझना मुश्किल नहीं रह जाता जब स्ट्रेयर ये कहते हैं कि ‘‘शासक समूह द्वारा कृषक आबादी के शोषण में ही सामंतवाद का सार निहित है।’’39 रस्थटन कोलबार्न ने भी इसी मान्यता को अपने लेख ‘द आइडिया आफ फ्यूडलिज़्म’ में व्यक्त किया है।40 हेनरी पिरेनी की राय में ‘फ्यूडलिज़्म’ एक ‘बंद जागीरी अर्थव्यवस्था’ थी जिसमें उत्पादन मुख्यतः उपभोग के लिए होता था और व्यापार लगभग था ही नहीं। मारिस डाब इसे सर्फडम (भू-दासता) का पर्याय बताते हैं। पेरी एण्डरसन की राय में ‘खंड-खंड प्रभुसत्ता और सोपानरूपा (स्कैलर) सम्पत्ति की उध्र्व रूप से व्यवस्थित प्रणाली में एक विशिष्ट प्रकार का संगठन ही वह चीज़ थी जो यूरोप की फ्यूडल उत्पादन-पद्धति की लाक्षणिक विशेषता थी।41

स्पष्ट है कि जितने विद्वान उतनी बातें। सम्भवतः इसी को मार्क ब्लाख ने ‘‘The various exotic versions of feudalism’’ यानी सामंतवाद के विभिन्न विचित्र संस्करण कहा है।42 इन तमाम व्याख्याओं के बीच जो एक बात तथ्य की तरह निर्विवाद है वह यह कि सामंती प्रणाली का अर्थ विशाल निम्नवर्गीय साधारण जनों का मुट्ठीभर शक्तिशाली मनुष्यों के प्रति कठोर आर्थिक परतंत्रता का संबंध था। चर्च ने इसका समर्थन किया, और ईसाई धर्म ने यहाँ आकर अपनी भूमिका बदल ली। प्राचीन काल में दास अपने मालिक की सेवा किसी धार्मिक निर्देश के कारण नहीं, बल्कि नग्न-शक्ति के सामने झुकने को मज़बूर होने के कारण करता था। यह ईसाई धर्म ही था कि जिसने मालिक के सामने झुकने को दास का धार्मिक कर्तव्य बनाया।43 ईसाई धर्म ने यह चरित्र सामंतवाद के विकास के साथ ग्रहण किया। मध्ययुग में जब चर्च न केवल शक्तिशाली होता है, बल्कि उसका वर्चस्व राज्यसत्ता पर भी हो जाता है तब ईसाई धर्म का रूप बदलता है।

ईसाई धर्म आरंभ में दासों और उत्पीड़ित जनों का धर्म था। इसके बारे में फ्रेडरिक ऐंगेल्स ने लिखा कि, ‘‘ईसाई धर्म ने एक ऐसा तार छुआ, जिसकी असंख्य हृदयों में अनुगूंज होनी थी। पापीपन की ईसाई चेतना कठिन जीवन और सर्वव्यापी भौतिक तथा नैतिक दरिद्रता की सभी शिकायतों का यह जवाब देती थी।’’44 लेकिन मध्ययुग की स्थिति बदली। ईसाई धर्म के राजकीय धर्म बनने पर ईसाई समुदायों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। मध्यवर्ग और दास-स्वामी वर्ग के अधिकांश भाग ने नया धर्म अपना लिया। इसके बाद से ईसाई धर्म दासों और उत्पीड़ितों का धर्म कतई नहीं रह गया। वह एक ऐसा धर्म बन गया, जिसकी मदद से सत्ता सम्पन्न वर्ग जनता को अपने नियंत्रण में रख सकते थे।45 चर्च ईसाइयत के माध्यम से राजनीतिक और सामाजिक जीवन का एक मात्र नियंता और नियामक बना। इसीलिए मार्क ब्लाख ने लिखा-‘‘हम सामंती यूरोप के धार्मिक अभिमत का वर्णन करते समय बिना सोचे-विचारे उसे ‘श्रद्धा-विश्वास का युग’ (Age of faith) कह देते हैं। यदि उस वाक्यांश से हमारा तात्पर्य संसार की ऐसी संकल्पना से है, जिसमें आधिभौतिक तत्व को उसका अनिवार्य अंग समझा जाए और उसके पृथक्करण को उस युग के दिमागों के लिए अजनबी माना जाए तथा उनकी तस्वीर मनुष्य के भाग्यों और विश्व के बारे में लगभग प्रत्येक मामले में पूर्णतः पाश्चात्यकृत क्रिश्चियन धर्मशास्त्र और आधिभौतिकी (eschatology) के द्वारा निर्मित की गई हो, तो इससे बढ़कर सच और कोई बात नहीं है।’’ उन्होंने कहा-‘‘यह कहने की अनुमति दी जा सकती है कि श्रद्धा-विश्वास ने इससे पूर्व अपने नाम की इतनी सार्थकता कभी व्यक्त नहीं की।46 इस श्रद्धा और विश्वास से जुड़ा कर्मकाण्ड और कट्टरता। जे॰ हुईजिंगा ने अपनी पुस्तक ‘दी वेनिंग आफ मिडिल ऐजेज़’ में लिखा, ‘‘धर्म इस सीमा तक जीवन में प्रवेश कर गया था कि आध्यात्मिक और क्षणिक का अंतर सामान्य जन की धारणा से प्रायः लुप्त हो चुका था। इस स्तरहीनता ने ईश्वर और धार्मिक गंभीरता को यहाँ तक गिराया कि जो धर्म के श्रेष्ठतम रहस्य और गंभीरतम विश्वास थे वे चमत्कार और बचपने में परिवर्तित हो चुके थे।’’47 सम्भवतः यही कारण है कि आज भी विद्वान उस युग को ‘अंधकार युग’ कहने में नहीं हिचकते।




36. मार्क ब्लाख, फ्यूडल सोसाइटी, पेज 446. अथवा मार्क ब्लाख, समांती समाज, भाग-2, पृ॰ 225.
37. इंसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका, वोल्यूम-9, पेज 218.
38. वही, पेज 219.
39. जोसेफ आर. स्ट्रेयर, फ्यूडलिज़्म, पेज 13.
40. फ्यूडलिज़्म इन हिस्ट्री, पेज 4.
41. हरबंस मुखिया, मध्यकालीन भारत: नए आयाम, पृ॰ 113-114 से उद्धृत.
42. मार्क ब्लाख, फ्यूडल सोसाइटी, पेज 441.
43. एस. तोकारेव, धर्म का इतिहास, पृ॰ 506.
44. वही, पृ॰ 439 से उद्धृत.
45. वही, पृ॰ 461.
46. मार्क ब्लाख, समांती समाज, भाग-1, पृ॰ 126-127.
47. नित्यानंद तिवारी, मध्ययुगीन रोमांचक आख्यान, पृ॰ 24 से उद्धृत.


क्रमश:
अगले अंक में भारतीय सामंतवाद

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