Wednesday, May 6, 2009

*** मध्यकालीनता की अवधारणा

जब हम आदि-मध्य-अंत कहते हैं तो यहाँ मध्य स्थितिबोधक है। जब हम प्राचीन, मध्यकालीन, अधुनातन अथवा आधुनिक कहते हैं, तो यहाँ मध्यकालीन, काल की स्थिति का वाचक होता है। लेकिन प्राचीनता, मध्यकालीनता और आधुनिकता जैसे शब्दों के बीच मध्यकालीनता भाववाची संज्ञा के रूप में आता है, जो एक निश्चित कालवाची स्थिति से उभर कर आनेवाली विशेष प्रकार की प्रवृत्ति का द्योतक होता है। यहीं से मध्यकालीनता शब्द का प्रयोग एक अवधारणा की तरह होता है।

कोई भी पद अपने ऐतिहासिक संदर्भों और परिप्रेक्ष्यों से जुड़कर ही अवधारणात्मक भूमिका ग्रहण करता है, अन्यथा वह ध्वनि-समूहों की सार्थक व्यवस्था मात्र होता है। ऐसे में मध्यकालीनता की अवधारणा को उसके ऐतिहासिक संदर्भों और परिप्रेक्ष्यों से, उसके निश्चित कालवाची स्थिति से अलग कर नहीं समझा जा सकता। अर्थात् इतिहास में जो मध्यकाल है, मध्यकालीनता की अवधारणा का उससे सीधा संबंध होना चाहिए।

इतिहास में मध्यकाल :-
इतिहास में मध्यकाल सामान्यतः प्राचीन काल और आधुनिक काल के बीच के दौर को इंगित करता है। आधुनिक युग का पूर्ववर्ती और प्राचीन काल के बाद का समय। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का कहना है कि ‘मध्ययुग’ या ‘मध्यकाल’ शब्द भारतीय भाषाओं में नया नहीं है।.....इस देश के प्राचीन साहित्य में इस प्रकार के किसी शब्द का प्रयोग नहीं मिलता।1 उनके अनुसार, यह शब्द अंग्रेजी के ‘मिडिल ऐज़ेज़’ के अनुकरण पर बना दिया गया है।2 जबकि डा. रामविलास शर्मा बताते हैं कि ऋग्वेद में एक कवि ने प्राचीन, मध्य और आधुनिक कालों में भेद किया है। उन्होंने लिखा, वेदों के कुछ विद्वान प्राचीन काल के हैं, कुछ मध्यकाल के हैं, कुछ आधुनिक काल के हैं।3 स्पष्ट है कि वेदों का मध्यकाल केवल समयवाची पद है, जबकि आज के इतिहासकार अथवा बुद्धिजीवी केवल समयवाची पद के रूप में मध्यकाल का प्रयोग नहीं करते, बल्कि बच्चन सिंह का कहा मानें तो ऐसे पदों के माध्यम से काल विभाजन अब पुराना पड़ गया है। न तो यह साहित्येतिहासकारों को मान्य है और न इतिहासकारों को। इतिहास लेखक एक कालावधि को एक शीर्षक में बाँध देता है; जैसे- 600 से 321 ई॰ पू॰ प्रजातंत्र एवं राजतंत्र।4 लेकिन वस्तुस्थिति भिन्न है। मध्ययुग शब्द का प्रयोग काल के अर्थ में उतना नहीं होता जितना एक ख़ास प्रकार की पतनोन्मुख और ज़बदी हुई मनोवृत्ति के अर्थ में होता है।5 इस प्रकार के मनोवृत्तिपरक अर्थ स्वीकार करने वाले लोग ही अंग्रेजी में ‘मिडिएवल’, ‘मिडिएवलिज़्म’ आदि शब्दों का व्यवहार करते हैं, और हिन्दी में मध्यकालीनता अथवा मध्ययुगीनता जैसे शब्दों का।6 इसलिए पुरानी पड़ जानेवाली बात स्वयं में निरर्थक है। अगर कुछ पुराना पड़ा है तो काल की प्राचीन चतुर्युगी चक्रीय धारणा।

भारतवर्ष में प्राचीन काल से कृत, त्रेता, द्वापर और कलि नाम के चार युगों की चर्चा मिलती है। ब्राह्मण और उपनिषद् ग्रन्थों में भी इन शब्दों का प्रयोग मिल जाता है। इन सब में कृत का प्रयोग अच्छे अर्थ में और त्रेता, द्वापर व कलि का प्रयोग क्रमशः कम अच्छे और अधिक बुरे अर्थों में हुआ है। अपना कालवाचक आधार त्यागकर धीरे-धीरे धार्मिक मनोवृत्ति की प्रबलता और क्षीणता ही इस प्रकार के युग विभाजन के विश्वास का आधार बनती गई है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि कृत या सत्य युग मंय धर्म की पूर्ण स्थिति थी। त्रेता में तीन चैथाई रह गई और द्वापर में आधी। कलिकाल में धर्म का प्रभाव और भी क्षीण हुआ और वह एक ही चरण पर खड़ा रह गया।7 कलियुग के बाद फिर कृत, त्रेता, द्वापर और अंत में कलि काल आएगा। यह चक्र अनादिकाल से चला आ रहा है और अनंत काल तक चलता जाएगा। काल की यह गति चक्रीय है, जो सनातनवादी चिंतन प्रस्तावित करता है। यूनान में एलिएटिक दार्शनिकों का कालबोध इसी प्रकार का अपरिवर्तनवादी, सनातनवादी बोध था। लेकिन आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल के रूप में विकास की धारणा आधुनिक ऐतिहासिक धारणा है, जिसका गहरा संबंध 19वीं सदी के विकासवादी दर्शन और वैज्ञानिक चिंतन से है। जब हम किसी को कलजुगी कहते हैं तो वास्तव में मध्यकालीन दृष्टिकोण से आधुनिकता पर व्यंग्य करते हैं। कलजुगी चारित्रिक अवहेलना का बोधक है। लेकिन आधुनिक व्यक्ति जब मध्यकालीन उपाधि देता है तो वह एक विशेष मानसिक-सांस्कृतिक संरचना की आलोचना करता है।8 आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा कि ‘कलियुगी’ शब्द में जो अनादर का भाव है वह चरित्रपरक होता है और ‘मिडिएवल’ (मध्ययुगीन) शब्द का अनादर भाव कुंठित-मनोवृत्तिपरक अर्थ में होता है।9

यह सत्य है कि भारत के इतिहास में मध्यकाल की अवधारणा बहुत कुछ यूरोपीय ढाँचे को लागू करने का परिणाम है। यह भी संभव है कि मध्यकाल अथवा मध्यकालीन चित्तवृत्ति जैसे शब्दों का प्रयोग अंग्रेजी के मिडिल एज़ अथवा मिडिएवल सेंसिबिलिटी के अनुकरण या प्रभाव का नतीजा हो। लेकिन भारत और यूरोप के मध्यकाल का स्वरूप एक-सा नहीं है। यूरोपीय इतिहास में रोमन साम्राज्य के पतन के बाद से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक अभ्युदय के पूर्व तक के काल को मध्ययुग या मध्यकाल कहा जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के पश्चिमी विचारकों ने साधारणतः सन् 476 ई॰ से लेकर 1553 ई॰ तक के काल को मध्ययुग कहा है।10 यह वह दौर है जब दास-प्रथा पर आधारित व्यवस्था का खात्मा होता है और सामंती व्यवस्था अपनी जड़ जमाती है। प्राचीन यूनानी दार्शनिक धरोहर का लोप हो गया। धर्म ने प्रभुत्वशाली विचारधारा का रूप ग्रहण कर लिया। शिक्षा चर्च के हाथों में पहुँच गयी, जिसके धर्म-सूत्र प्रकृति, जगत तथा मनुष्य के विषय में समस्त धारणाओं का आधार बन गए।11 चर्च न केवल नैतिक नियमों की व्याख्या का अधिकार रखता था, वरन् समानता की धारणा को भी वही तय करता था।12 चर्च बड़ा शक्तिशाली संगठन था। राजकाज की नीति से लेकर व्यवहारिक जीवन के नियम तक चर्च ही सर्वाधिक करता था। राजा व अभिजात लोग भी इन धर्माध्यक्षों व मठों के अधीन रहते थे।13 उस समय के एक दस्तावेज़ में कहा गया है कि पुरोहितों ने श्रद्धालुओं को दिव्य राज्य के परमानंद से आकर्षित करके, नरक की अनंत यातनाओं का डर दिखाकर अज्ञानी मूर्खों को उनकी धन-सम्पत्ति से और वैध वारिसों को उनकी विरासत से वंचित करके’’ अपनी दौलत को बढ़ाया।14 स्थिति यह थी कि एक हजार वर्ष से भी अधिक समय के मध्ययुग के विकास के परिणाम दर्शन तथा विज्ञान, दोनों के लिए नगण्य थे, क्योंकि महान् चिंतकों तक ने इतनी खोज सत्य की नहीं की, जितनी की धर्म के पक्ष-मंडन की विधियों का किया। मध्ययुगीन समाज की पुरोहितवादी सत्ता ने उन लोगों की पहल और चिंतन को बेड़ियों में बाँधकर रखा, जिन्होंने इस चैखटे से बाहर जाने की जुर्रत की।15 इसीलिए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा कि यूरोपीय इतिहास के इसी युग में यह शास्त्रार्थ प्रबल रूप धारण करता है कि सुई की नोक पर कितने फ़रिश्ते खड़े हो सकते हैं।16

इस स्थिति को और अधिक स्पष्ट करते हुए फ्रेडरिक ऐंगेल्स ने लिखा-मध्ययुगों का विकास सर्वथा अपरिष्कृत स्थिति से हुआ था। हर चीज़ का नये सिरे से श्रीगणेश करने के लिए पुरानी सभ्यता, पुराने दर्शन, पुरानी राजनीति तथा विधिशास्त्र को उन्होंने बिल्कुल साफ़ कर दिया था। पुरानी ध्वस्त दुनियाँ में से जिस एकमात्र चीज़ को उन्होंने बना रहने दिया वह था ईसाई धर्म। इसके अलावा बस कुछ अर्ध-ध्वस्त ऐसे नगर बच गए थे जिनकी सारी सभ्यता नष्ट कर दी गई थी। फलस्वरूप जैसा कि विकास की प्रत्येक आदिम अवस्था में होता आया है, पादरियों के वर्ग को बौद्धिक शिक्षा की इज़ारेदारी प्राप्त हो गयी और शिक्षा स्वयं मूलतः धार्मिक शिक्षा बन गयी। पादरियों के हाथ में अन्य तमाम विद्वानों की तरह, राजनीति तथा विधिशास्त्र भी धर्म-दर्शन की मात्र शाखाएँ बने रहे। उन पर भी धर्म-दर्शन के प्रचलित सिद्धान्तों के आधार पर ही अमल किया जाता रहा। गिरजे के अंध मतों को राजनीति के भी स्वयम्-सिद्ध सत्यों के रूप में माना जाता था, और अदालतों में बाइबिल के उदाहरणों का वही मान था जो कानून का था।......बौद्धिक क्रियाकलापों के सम्पूर्ण क्षेत्र में धर्मशास्त्र का यह प्रभुत्व उस स्थान का अनिवार्य परिणाम था जो उस समय गिरजे को प्राप्त था। तत्कालीन सामंती आधिपत्य का सबसे आम संश्लेषित रूप था तथा वही उसके शासन का अनुमोदन समर्थक था।17 इन्हीं कारणों से इस युग को यूरोपीय इतिहास में ‘अंधकार युग’ कहा जाता है। स्पष्ट है कि मध्यकालीनता अंधकारयुगीन सांस्कृतिक-मानसिक जड़ता को अभिव्यक्त करता है।

इस अंधकार में थोड़ी-सी रौशनी तब फूटती है जब रेनेसां यानी पुनर्जागरण का दौर आता है। यूँ तो सामंतवाद के खि़लाफ क्रांतिकारी विरोध का क्रम मध्ययुग के पूरे काल में चला था। समय की परिस्थिति के अनुसार, कभी उसने रहस्यवाद का रूप ग्रहण किया, कभी खुले धर्म-विरोध का, और कभी सशस्त्र विद्रोह का। यह विरोध रेनेसां के बाद और तीव्र होता है। रेनेसां ने धर्म के वर्चस्ववादी सत्ता अधिष्ठानों को चुनौती दी। यूरोपीय संस्कृति में नए जीवन का संचार हुआ। इस युग में नए-नए अन्वेषण और आविष्कार हुए, धर्म और दर्शन का नया संस्करण किया गया, कला और विज्ञान की नयी साधना का समारम्भ हुआ, राजनीति और समाज व्यवस्था में मौलिक क्रांति का सूत्रपात हुआ।18 रेनेसां का दौर वह दौर है जिसे जर्मन अपने ऊपर आयी राष्ट्रीय विपदा के नाम पर धर्म सुधार का काल कहते हैं और फ्रांसीसी लोग पुनर्जागरणकाल तथा इतावली लोग चिन्क्वेचेंटो कहते हैं। ऐंगेल्स के अनुसार, इनमें से कोई भी नाम उसके सार को पूर्णतः अभिव्यक्त नहीं करता।19 मानवजाति के इतिहास में बड़ी प्रगतिशील क्रांति के रूप में प्रस्तुत करते हुए उसके बारे में ऐंगेल्स ने लिखा कि मनुष्यों के मस्तिष्क पर चर्च का अधिनायकत्व चकनाचूर हो गया। अधिकांश जर्मन जातियों ने प्रोटेस्टेंट मत स्वीकार करके इस अधिनायकत्व को प्रत्यक्षतः तिलांजलि दे दी, जबकि अरबों से प्राप्त और नवान्वेषित यूनानी दर्शन से आहार पाकर पुष्ट स्वतन्त्र चिंतन की एक उल्लास युक्त नयी भावना अधिकाधिक घर करने लगी और 18वीं सदी के भौतिकवाद के लिए मार्ग प्रशस्त करने लगी।20 यह मध्यकाल का उत्तरवर्ती दौर था।

न केवल अध्ययन की सुविधा के लिए वरन् कुछ मूलभूत प्रवृत्तिगत अंतराल के कारण इतिहासकारों ने मध्यकाल को दो हिस्सों में विभाजित किया है। एक, पूर्व-मध्यकाल और दूसरा उत्तर-मध्यकाल। सामान्यतः 476ई. से 1000ई. तक के काल को पूर्व मध्यकाल तथा 11वीं शताब्दी से 15वीं शताब्दी का दौर उत्तर-मध्यकाल कहा जाता है।21 उत्तर-मध्यकाल के दूसरे छोर को सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक भी ले जाया जाता है। पूर्व-मध्ययुग और उत्तर-मध्ययुग का अंतर इसी बात पर आधारित है कि पूर्व-मध्ययुग समष्टिगत दृष्टि से प्रायः ह्रासोन्मुख है और उत्तर-मध्ययुग में पुनरुत्थान की प्रवृत्तियाँ हुई हैं।22


1. हजारीप्रसाद द्विवेदी, हजारीप्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली, भाग-5, पृ॰ 19.
2. वही, पृ॰ 23.
3. रामविलास शर्मा, भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश, खण्ड-1, पृ॰ 437.
4. डा. बच्चन सिंह, हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, (भूमिका से)
5. हजारीप्रसाद द्विवेदी, हजारीप्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली, भाग-5, पृ॰ 23-24.
6. वही.
7. हजारीप्रसाद द्विवेदी, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, पृ॰ 12-13.
8. ‘मित्र’, अंक-दो, सम्पा. मिथिलेश्वर, वर्ष-2003, पृ॰ 67-68
9. हजारीप्रसाद द्विवेदी, हजारीप्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली, भाग-5, पृ॰ 24.
10. वही, पृ॰ 23.
11. दर्शन कोश, पृ॰ 469.
12. इंसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका, वोल्यूम-15, पेज 404.
13. ये. अगिबलोवा/ग. देन्स्कोय, मध्ययुग का इतिहास, पृ॰ 23.
14. वही, पृ॰ 23 से उद्धृत.
15. दर्शन कोश, पृ॰ 470.
16. हजारीप्रसाद द्विवेदी, हजारीप्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली, भाग-5, पृ॰ 23-24.
17. कार्ल माक्र्स और फ्रेडरिक ऐंगेल्स, धर्म, पृ॰ 95.
18. हिन्दी साहित्य कोश, भाग-1, पृ॰ 403.
19. माक्र्स/ऐंगेल्स, साहित्य तथा कला, पृ॰ 288.
20. वही, पृ॰ 289.
21. जगदीश पी. शर्मा, वर्ल्ड हिस्ट्री-न्यू होरिजान्स, पेज-4.
22. हिन्दी साहित्य कोश, भाग-1, पृ॰ 609.


क्रमश: .............................................

अगले अंक में

1 comments

Sachin jha April 20, 2012 at 1:55 PM

Gr8 sir apne kya link share kiya hai...